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Parakram Diwas 2026 | 23 जनवरी को क्यों मनाया जाता है? जानें नेताजी जयंती का महत्व और इतिहास

Parakram Diwas 2026 | Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti 2026 भारत के महान क्रांतिकारी और ‘आजाद हिंद फौज’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम आते ही रगों में देशभक्ति का खून दौड़ने लगता है। साल 2026 में हम उनकी 129वीं जयंती मनाने जा रहे हैं।

भारत सरकार ने उनके सम्मान में इस दिन को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में घोषित किया है। आज के इस लेख में हम जानेंगे कि आखिर यह दिन क्यों मनाया जाता है और इसका महत्व क्या है।

Parakram Diwas 2026
Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti 2026

Parakram Diwas 2026 | पराक्रम दिवस क्या है और कब शुरू हुआ?

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अदम्य बहादुरी और राष्ट्र के प्रति उनके निस्वार्थ सेवा को सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने उनके जन्मदिन, 23 जनवरी को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में घोषित किया है।

पराक्रम दिवस की शुरुआत और इतिहास: पराक्रम दिवस मनाने की घोषणा वर्ष 2021 में की गई थी। केंद्र सरकार ने नेताजी की 125वीं जयंती के अवसर पर यह ऐतिहासिक निर्णय लिया था।

संस्कृति मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, नेताजी की अदम्य भावना और राष्ट्र के प्रति उनके अटूट प्रेम को याद करने और युवा पीढ़ी को प्रेरित करने के लिए हर साल इस दिन को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा।

23 जनवरी 2021 को कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में पहली बार आधिकारिक रूप से पराक्रम दिवस मनाया गया था।

यह क्यों मनाया जाता है? नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ का गठन कर अंग्रेजों की नींव हिला दी थी। उन्होंने दुनिया भर के देशों में घूमकर भारत की आजादी के लिए समर्थन जुटाया।

उनका नारा “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” आज भी हर भारतीय के भीतर जोश भर देता है। पराक्रम दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य देश के नागरिकों, विशेषकर युवाओं को यह याद दिलाना है कि आजादी केवल शांति वार्ताओं से नहीं, बल्कि नेताजी जैसे वीर नायकों के त्याग, शौर्य और ‘पराक्रम’ से मिली है।

2026 में महत्व: साल 2026 में हम नेताजी की 129वीं जयंती मना रहे हैं। आज के समय में जब भारत वैश्विक शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, नेताजी के विचार और उनका ‘सेल्फ-कॉन्फिडेंस’ (आत्मविश्वास) युवाओं के लिए मार्गदर्शक का काम करता है।

स्कूलों, कॉलेजों और सरकारी संस्थानों में इस दिन कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहाँ नेताजी के जीवन संघर्ष और आजाद हिंद फौज की गाथा सुनाई जाती है।

यह दिन हमें सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए और राष्ट्रहित को हमेशा सर्वोपरि रखना चाहिए। ‘पराक्रम दिवस’ वास्तव में भारत के उस ‘पराक्रमी’ सपूत को समर्पित एक राष्ट्रीय सलाम है।

📌 भारत सरकार ने साल 2021 में नेताजी की 125वीं जयंती के अवसर पर 23 जनवरी को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया था।

📌 इसका उद्देश्य देश के युवाओं को नेताजी के जीवन से प्रेरणा देना और उनमें अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति की भावना जागृत करना है।

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23 जनवरी 2026 – नेताजी की 129वीं जयंती | 23 January Parakram Diwas history in Hindi

23 जनवरी 2026: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती का विशेष महत्व वर्ष 2026 का 23 जनवरी का दिन पूरे भारत के लिए बेहद गर्व और सम्मान का दिन है। इस साल देश महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती मना रहा है।

यह दिन केवल एक महापुरुष का जन्मदिन भर नहीं है, बल्कि यह उस क्रांतिकारी विचारधारा का उत्सव है जिसने भारत की आजादी की दिशा और दशा बदल दी थी।

2026 में उत्सव की भव्यता: 129वीं जयंती के अवसर पर भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। स्कूलों और कॉलेजों में ‘पराक्रम दिवस’ के उपलक्ष्य में भाषण, निबंध लेखन और चित्रकला प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है,

ताकि नई पीढ़ी नेताजी के बलिदान को समझ सके। नई दिल्ली के इंडिया गेट पर स्थित नेताजी की भव्य प्रतिमा पर इस दिन विशेष पुष्पांजलि अर्पित की जाती है, जो उनके अदम्य साहस का प्रतीक है।

नेताजी की प्रासंगिकता आज के दौर में: आज जब भारत ‘आत्मनिर्भर’ होने और ‘विकसित भारत’ के सपने को पूरा करने की ओर बढ़ रहा है, नेताजी के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। नेताजी का मानना था

कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके युवाओं के अनुशासन और राष्ट्रप्रेम पर निर्भर करती है। उनकी 129वीं जयंती हमें यह याद दिलाती है कि ‘जय हिंद’ का नारा केवल एक अभिवादन नहीं, बल्कि एकता का सूत्र है जो पूरे देश को जोड़ता है।

आजाद हिंद फौज की विरासत: इस वर्ष की जयंती हमें आजाद हिंद फौज (INA) के उन वीर सिपाहियों के योगदान की भी याद दिलाती है, जिन्होंने देश के बाहर रहकर भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। अंडमान और निकोबार द्वीपों पर तिरंगा फहराने की उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि को आज के दिन विशेष रूप से याद किया जाता है।

Parakram Diwas 2026: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 129वीं जयंती हमें संकल्प लेने के लिए प्रेरित करती है उनका जीवन हमें सिखाता है कि बाधाएं चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि संकल्प मजबूत हो तो लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। आइए, इस 23 जनवरी 2026 को हम नेताजी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का प्रण लें और एक सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।

📌 इस साल यानी 2026 में देश नेताजी की 129वीं जयंती मना रहा है।

📌 पूरे देश में स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तरों में कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं।

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पराक्रम दिवस का महत्व (Significance) | नेताजी की 129वीं जयंती | 23 January Parakram Diwas history in Hindi

पराक्रम दिवस का महत्व: भारत के शौर्य और स्वाभिमान का प्रतीक

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 जनवरी का दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। इस दिन को ‘पराक्रम दिवस’ के रूप में मनाना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह भारत के उस ‘पराक्रमी’ सपूत के प्रति राष्ट्र की कृतज्ञता का प्रकटीकरण है, जिसने अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग कर मातृभूमि की बेड़ियों को काटने का संकल्प लिया था।

पराक्रम दिवस का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत :- पराक्रम दिवस का सबसे बड़ा महत्व देश की युवा पीढ़ी से जुड़ा है। आज के प्रतिस्पर्धी युग में जब युवा मानसिक मजबूती और दिशा की तलाश में हैं, नेताजी का जीवन उन्हें ‘कभी हार न मानने’ (Never Give Up) की सीख देता है।

नेताजी ने सिखाया कि लक्ष्य चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि आपके पास साहस और स्पष्ट विज़न है, तो आप दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति से भी टकरा सकते हैं। यह दिन युवाओं को अपनी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण में लगाने के लिए प्रेरित करता है।

सैन्य शक्ति और एकता का संदेश :- नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) का गठन करके यह साबित कर दिया था कि एक संगठित सेना ही किसी भी साम्राज्यवादी शक्ति को उखाड़ फेंकने में सक्षम है।

पराक्रम दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत की आजादी केवल बातचीत का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसमें सीमाओं पर लड़े गए युद्ध और सैनिकों का बलिदान भी शामिल था। यह दिन भारतीय सेना के शौर्य को सम्मान देने और देश में ‘एकता और अनुशासन’ का संचार करने का प्रतीक है।

राष्ट्रीय स्वाभिमान की जागृति :- लंबे समय तक भारतीय इतिहास के पन्नों में नेताजी के योगदान को वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। पराक्रम दिवस की घोषणा ने देशवासियों के भीतर एक नए ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ को जन्म दिया है।

यह दिन हमें अपनी उन जड़ों और नायकों पर गर्व करना सिखाता है जिन्होंने ‘स्वराज’ के सपने को अपनी आँखों में पाल रखा था। इंडिया गेट पर नेताजी की प्रतिमा का होना और 23 जनवरी को उत्सव मनाना, भारत के पुनरुत्थान का संकेत है।

विविधता में एकता का आदर्श :- नेताजी की आजाद हिंद फौज में हर धर्म, जाति और प्रांत के लोग शामिल थे। वहां न कोई हिंदू था, न मुसलमान, न सिख—वहां सब केवल ‘भारतीय’ थे।

पराक्रम दिवस का महत्व इस ‘विविधता में एकता’ के विचार को जीवित रखने में है। आज के दौर में यह दिन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की प्रगति के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर एक होना कितना अनिवार्य है।

वैश्विक पहचान और कूटनीति :- नेताजी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आजादी की आवाज उठाई थी। पराक्रम दिवस के माध्यम से भारत दुनिया को यह संदेश देता है कि वह अपने उन नायकों का सम्मान करना जानता है

जिन्होंने वैश्विक पटल पर भारत का नाम रोशन किया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत का संघर्ष केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय की लड़ाई थी।

    पराक्रम दिवस केवल 24 घंटे का कोई उत्सव नहीं है, बल्कि यह एक ‘विचारधारा’ है। यह साहस, त्याग, समर्पण और निस्वार्थ सेवा का पर्व है। जब तक भारत का अस्तित्व रहेगा, नेताजी का ‘पराक्रम’ हर भारतीय के दिल में मशाल बनकर जलता रहेगा।

    📌 नेताजी ने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के नारे के साथ पूरे देश को एकजुट किया था।

    📌 पराक्रम दिवस हमें याद दिलाता है कि आजादी केवल अहिंसा से नहीं, बल्कि साहस और बलिदान से भी प्राप्त की गई थी।

    📌 यह दिन भारतीय सेना और आजाद हिंद फौज के शौर्य को सम्मान देने का दिन है।

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    निष्कर्ष (Conclusion):

    नेताजी सुभाष चंद्र बोस केवल एक नेता नहीं थे, वे एक विचार थे। ‘पराक्रम दिवस’ उनके इसी विचार और साहस को सलाम करने का दिन है। आइए, इस 23 जनवरी हम भी उनके दिखाए राष्ट्र-सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लें।


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