Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay हिंदी साहित्य में ‘मनोवैज्ञानिक कथाधारा’ के प्रवर्तक कहे जाने वाले पंडित जैनेंद्र कुमार एक ऐसे साहित्यकार थे जिन्होंने मनुष्य के अंतर्मन की गहराइयों को शब्दों में पिरोया।
प्रेमचंद के बाद हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में जैनेंद्र कुमार का नाम सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने न केवल कहानियाँ और उपन्यास लिखे, बल्कि दर्शन और चिंतन के माध्यम से हिंदी गद्य को एक नई दिशा दी। उन्हें हिंदी साहित्य का ‘गोर्की’ भी कहा जाता है।
जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय Jainendra Kumar Ki Bhasha Shaili जैनेंद्र कुमार जी के बारे में पूरी जानकारी जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय कक्षा 12 आज की पोस्ट में हम आपको देंगे।
जैनेंद्र कुमार 20वीं सदी के भारतीय लेखक थे जिन्होंने हिंदी में लिखा था उन्होंने सुनीता और त्यागपत्र सहित उपन्यास लिखे। उन्हें 1971 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay | जैनेन्द्र कुमार की प्रमुख रचनाएँ
जैनेंद्र कुमार (2 जनवरी 1905 – 24 दिसंबर 1988) 20वीं सदी के भारतीय लेखक थे जिन्होंने हिंदी में लिखा। उन्होंने सुनीता और त्यागपत्र सहित उपन्यास लिखे। उन्हें 1971 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक, पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
उन्हें 1966 में साहित्य अकादमी द्वारा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, उनके काम के लिए मुक्तिबोध (नवीनतम), और इसके सर्वोच्च पुरस्कार, 1979 में साहित्य अकादमी फैलोशिप।
जैनेंद्र कुमार का साहित्यिक परिचय | Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay list
| क्र.सं. | विवरण बिंदु | जानकारी |
| 1 | नाम | जैनेंद्र कुमार (बचपन का नाम: आनंदी लाल) |
| 2 | जन्म तिथि | 2 जनवरी, 1905 |
| 3 | जन्म स्थान | कौड़ियागंज, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) |
| 4 | माता-पिता | पिता: प्यारे लाल, माता: रामदेवी |
| 5 | प्रारंभिक शिक्षा | हस्तिनापुर के ‘जैन गुरुकुल’ में (यहीं से इनका नाम ‘जैनेंद्र’ पड़ा) |
| 6 | उच्च शिक्षा | काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी (अधूरी रही) |
| 7 | आंदोलन में भागीदारी | 1921 में गांधी जी के आह्वान पर ‘असहयोग आंदोलन’ में शामिल हुए |
| 8 | साहित्यिक विधा | उपन्यास, कहानी, निबंध और संस्मरण |
| 9 | मुख्य विचारधारा | गांधीवाद और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण |
| 10 | प्रसिद्ध उपन्यास | परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, सुखदा, विवर्त |
| 11 | कहानी संग्रह | फाँसी, पाजेब, दो चिड़ियाँ, नीलम देश की राजकन्या, एक रात |
| 12 | निबंध संग्रह | प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, पूर्वोदय, साहित्य का श्रेय और प्रेय |
| 13 | प्रमुख सम्मान | साहित्य अकादमी पुरस्कार (1966), पद्म भूषण (1971) |
| 14 | साहित्यिक विशेषता | हिंदी उपन्यास में ‘मनोवैज्ञानिक विश्लेषण’ का सूत्रपात किया |
| 15 | मृत्यु | 24 दिसंबर, 1988 |
Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay | जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय
- जन्म 2 जनवरी 1905
- कोडियागंज, आगरा और अवध के संयुक्त प्रांत, ब्रिटिश भारत
- मृत्यु 24 दिसंबर 1988 (उम्र 83)
- भाषा हिंदी
- राष्ट्रीयता भारतीय
- उल्लेखनीय कार्य
पारखी पाप और प्रकाश मुक्तिबोधि
- उल्लेखनीय पुरस्कार
पद्म भूषण 1971
साहित्य अकादमी फैलोशिप 1979
साहित्य अकादमी पुरस्कार 1966
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Jainendra Kumar Jeevan Parichay Literary works
- सुनीता
- नीलम देश की राजकन्या
- चिड़िया की भछी
- एक रात
- वातायण
- पारखी
- अंकिता
- सुखदा
- कल्याणी
- जयवर्धन
- दशर्क
- अकाल पुरुष गांधी
- प्रेमचंद: एक कृति व्यक्तित्व:
- साहित्य का श्रेय और प्रिय
- समय और हम
- जीवन साहित्य और परम्पराएं
- गांधी और हमारा समय तथा संस्कृति
- खेल
- पजेब
- पटनी
- अपना अपना भाग्य
- मुक्तिबोधि
- “आत्मा शिक्षण” (लघुकथा)
जैनेंद्र कुमार का प्रसिद्ध विचार
“अधिकार को छोड़ देने से ही शांति मिलती है। जो पकड़ता है, वह परेशान रहता है, जो छोड़ता है वही मुक्त होता है।” — जैनेंद्र कुमार
Jainendra Kumar Ka Jeevan Parichay | जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय कक्षा 12
श्री जैनेंद्र कुमार सुप्रसिद्ध कथाकार थे किंतु उन्होंने उच्च कोटि का निबंध साहित्य लिखा उनका जन्म सन 1905 को अलीगढ़ जिले के कोडीयागंज नामक गांव में हुआ।
उनकी आरंभिक शिक्षा हस्तिनापुर जिला मेरठ में हुई। उन्होंने 1919 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास की तत्पश्चात उन्होंने काशी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश लिया।
किंतु गांधी जी के पावन पढ़ाई छोड़ कर वह असहयोगआंदोलन में शामिल हो गए।
गांधी जी के जीवन दर्शन का प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है जैनेंद्र जी के कथा साहित्य के साथ साथ उच्चकोटि के निबन्धों की रचना भी की।
सन 1970 में उनकी महान साहित्यिक सेवाओ के कारण भारत सरकार ने उन्हें “पद्मभूषण” से समानित किय।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी सन1973 में इन्हें डी० लिट् की मानद उपाधि से विभूषित किया।
जैनेंद्र कुमार को “साहित्य अकादेमी” तथा “भारत – भारती” पुरस्कारों से भी समानित किया गया। सन 1990 में उनक़्क़ देहांत हो गया।
Jainendra Kumar Ka Jeevan Parichay | जैनेंद्र कुमार जी की प्रमुख रचनाए
श्री जैनेंद्र प्रसाद की प्रमुख रचनाए निम्नलिखित है –
(1) उपन्यास :- “परख” (1929), “सुनीता” (1935), “कल्याणी” (1939), “त्यागपत्र” (1937), “विवर्त” (1953), “सुखदा” (1953), “व्यतीत” (1953), “जयवर्धन” (1953), “मुक्तिबोध”।
(2) कहानी संग्रह :- “फांसी” (1929), “वातायन” (1930), “नीलम देश की राजकन्या” (1933), “एक रात” (1934), “दो चिड़िया” (1935), “पाजेब” (1942), “जयसंधि” (1929)।
(3) निबंध संग्रह :- “प्रस्तुत प्रशन” (1936), “जड़ की बात” (1945), “पूर्वोदय” (1951), “साहित्य का श्रेय और प्रेय” (1953), “मंथन” (1953), “सोच विचार” (1953), “काम,प्रेम और परिवार” (1953), “ये और वे” (1954), “साहित्य चयन” (1951), “विचार वल्लरी” (1952)।
जैनेंद्र कुमार ने प्रायः विचार प्रधान निबंध ही लिखे है उनके निबंधों में लेखक एक गंभीर चिंतक के रूप में हमारे सामने आता है।
यह विषय साहित्य समाज राजनीति संस्कृति धर्म तथा दर्शन से संबंधित हैं भले ही हिंदी साहित्य में वे एक मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार तथा कहानीकार के रूप में प्रसिद्ध हैं।
परंतु निबंध लेखक के रूप में उन्हें विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई है वस्तुत उनके निबंधों में विचारीक गहनता के गुण देखे जा सकते हैं।
एक गंभीर चिंतक होने के कारण वे अपने प्रत्येक निबंध के विषय में सभी पहलुओं पर समुचित प्रकाश डालते हैं इसके लिए हम उनके निबंध बाजार दर्शन को ले सकते हैं।
जिसमें उपभोक्तावाद तथा बाजारवाद पर व्यापक चर्चा देखी जा सकती है भले ही यह निबंध कुछ दशक पहले लिखा गया हो।
परंतु आज भी इसकी उपयोगिता संदिग्ध है। इसमें लेखक यह स्पष्ट करता है कि यदि हम अपनी आवश्यकताओं को ठीक-ठीक समझ कर बाजार का उपयोग करेंगे तो निश्चय ही हम उसे लाभ उठा सकेंगे।
परंतु यदि हम खाली मन के साथ बाजार में जाएंगे। तो उसकी चमक दमक में फंसकर अनावश्यक वस्तुएं खरीद कर लाएंगे जो आगे चलकर हमारी शांति को भंग करेगी।
वह प्रत्येक निबंध में अपने दार्शनिक अंदाज में अपनी बात को समझाने का प्रयास करते हैं। .
परंतु फिर भी कहीं कहीं उनके विचार स्पष्ट और दुरूह बन जाते हैं। जिसके फलस्वरूप पाठक का साधारणी करण नहीं हो पाता।
जैनेंद्र कुमार की प्रमुख रचनाएँ (लिस्ट) | jainendra kumar jeevan parichay
- उपन्यास: परख, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, सुखदा, विवर्त।
- कहानी संग्रह: फाँसी, वातायन, दो चिड़ियाँ, एक रात, नीलम देश की राजकन्या, पाजेब।
- निबंध संग्रह: प्रस्तुत प्रश्न, जड़ की बात, साहित्य का श्रेय और प्रेय।
उन्हें ‘हिंदी का गोर्की’ क्यों कहा जाता है?
जैनेंद्र कुमार जी ने रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की तरह ही समाज के दबे-कुचले और आम आदमी की मानसिक स्थिति का गहराई से वर्णन किया है। इसीलिए हिंदी साहित्य के विद्वान उन्हें अक्सर ‘हिंदी का गोर्की’ कहकर पुकारते हैं।
Jainendra Kumar Ki Bhasha Shaili | जैनेंद्र कुमार की भाषा शैली बताइए
जैनेंद्र कुमार की भाषा शैली यद्यपि कथा साहित्य में जैनेंद्र कुमार ने सहज सरल तथा स्वाभाविक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
परंतु निबंधों में उनकी भाषा दुरूह एवं अस्पष्ट बन जाती है फिर भी वह संबिधनात्मक तथा वार्तालाप शैलियों का प्रयोग करते समय अपनी बात को सहजता तथा सरलता से करने में सफल हुए हैं।
यद्यपि वह भाषा में प्रयुक्त वाक्यों के संबंध में व्याकरण के नियमों का पालन नहीं करते।
फिर भी उनके द्वारा प्रयुक्त वाक्यों की अशुद्धि कहीं नहीं खटकती उनकी भाषा में रोचकता आदि से अंत तक बनी रहती है।
वह अपने भाषा में प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग करते हैं यत्र तत्र व अंग्रेजी उर्दू तथा देशज शब्दों का मिश्रण कर लेते हैं।
श्री तारा शंकर के शब्दों में “जिनेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता इन की रचना का चमत्कार,कहने का ढंग से ली है।”
उनकी भाषा के वाक्य प्राय छोटे-छोटे,चलते,परंतु साधनों फूल बिखरते चलते हैं वे पारे की तरह ढुलमुल करते रहते हैं।
जैनेंद्र को न तो उर्दू से घृणा है, न अंग्रेजी से परहेज है और ना ही संस्कृत से दुराव है इसलिए उनकी भाषा सहज, सरल तथा परवाहमयी है।
“जैनेंद्र कुमार एक उदाहरण देखिए-
“यहां मुझे ज्ञात है कि बाजार को सारक्तकता भी वही मनुष्य देता है जो जनता है।
कि वह क्या चाहता है और जो नही जानते कि वे क्या चाहते है, अपनी ‘पर्चेजिंग पावर ‘ के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शैतानी शक्त्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाजार को देते है।
न तो वे बाजार से लाभ उठा सकते है, न तो उस बाजार को सचा लाभ दे सकते है ।”
अर्थ: जैनों के भगवान एक लड़के के नाम के रूप में जैनेंद्र संस्कृत मूल का है जिसका अर्थ है “जैनों के भगवान”।
FAQ’s – Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay
Q. :- 1. Jainendra Kumar Ka Janm Kab Hua?
Ans. :- जन्म 2 जनवरी 1905.
Q. :- 2. Jainendra Kumar Ki Mrityu Kab Hui Thi?
Ans. :- मृत्यु 24 दिसंबर 1988 (उम्र 83).
Q. :- 3. जैनेंद्र कुमार के पिता का क्या नाम था?
Ans. :- जैनेंद्र कुमार के पिता का नाम प्यारे लाल और उनकी माता का नाम रामदेवी बाई था।
Q. :- 4. जैनेंद्र का मतलब क्या होता है?
Ans. :- जैनों के भगवान।
Q. :- 5. जैनेंद्र के बचपन का नाम क्या था?
Ans. :- उनके बचपन का नाम आनंदीलाल था।
Q. :- 6. जैनेंद्र कुमार का साहित्य में स्थान?
Ans. :- प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्र कुमार (२ जनवरी, १९०५- २४ दिसंबर, १९८८) का विशिष्ट स्थान है।
Q. :- 7. Neelam Desh Ki Rajkanya?
Ans. :- Neelam Desh Ki Rajkanya Book Jainendra Kumar Ji Dawara Likhit Hai.
Q. :- 8. नीलम देश की राजकन्या कहानी?
Ans. :- नीलम देश की राजकन्या’ कहानीकार जैनेंद्र कुमार विरचित उनकी एक मनोवैज्ञानिक कहानी है।
Q. :- 9. जैनेन्द्र कुमार के उपन्यास की विशेषता?
Ans. :- क्रांतिकारिता तथा आतंकवादिता के तत्व भी जैनेंद्र के उपन्यासों के महत्वपूर्ण आधार है।
उनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति में आस्था रखते हैं।
बाहरी स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना लिए होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं।
Q. :- 10. जैनेंद्र कुमार की दो रचनाएं?
Ans. :- जैनेंद्र कुमार की दो रचनाएं निबंध संग्रह और उपन्यास है।
Q. :- 11. जैनेंद्र कुमार को कौन सा पुरस्कार मिला?
Ans. :- जैनेंद्र कुमार को उनके लेखन के लिए 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1971 में भारत सरकार ने पदमभूषण सम्मान से नवाजा।
Q. :- 12. Nilam Desh Ki Rajkanya Kahani?
Ans. :- Nilam Desh Ki Rajkanya Kahani Jainendra Kumar Ki.
Q. :- 13. जैनेंद्र कुमार के माता पिता का नाम?
Ans. :- जैनेंद्र कुमार के माता पिता का नाम प्यारे लाल।
निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय, साहित्यिक योगदान और कृतियाँ | Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay हिंदी साहित्य के उन बिरले लेखकों में से एक हैं जिन्होंने गांधीवादी विचारधारा और मनोविज्ञान का अद्भुत समन्वय किया। उनकी रचनाएँ आज भी समाज और व्यक्ति के द्वंद्व को समझने में मील का पत्थर साबित होती हैं।
चाहे वह ‘त्यागपत्र’ उपन्यास हो या ‘पाजेब’ कहानी, उनकी हर कृति पाठकों को गहरे चिंतन के लिए मजबूर करती है। हिंदी गद्य साहित्य हमेशा उनके योगदान का ऋणी रहेगा।
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